एक दौर था बचपन का - by Gauri Tiwari
एक दौर था बचपन का
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एक दौर था बचपन का,
जब हम माँ के सहारे के बिना,
एक कदम भी चल नहीं पाते थे।
एक दौर था बचपन का,
जब हम मिट्टी के,
खिलौने से खेला करते थे।
एक दौर था बचपन का,
जब हम माँ के हाथों से,
खाना खाया करते थे।
एक दौर था बचपन का,
जब हम पिता के,
कंधों पर खेला करते थे।
एक दौर था बचपन का,
जब हम लोरियाँ,
सुनकर सोया करते थे।
अब एक नया दौर आया है,
जिसने अपनो को किया पराया है।
अब कदर नहीं होती उनकी,
जिन्होंने हमें दुनिया में लाया है।
अब मिट्टी के खिलौने बिकते नहीं,
प्लास्टिक के खिलौने भरे पड़े हैं।
अब माँ के हाथों के खाना जजते नहीं,
होटल ,रेस्टोरेंट के खाने अच्छे लगते हैं।
अब पिता के कंधे भाते नहीं,
बागों के झूले सच्चे लगते हैं।
अब माँ की लोरी छोड़,
फिल्मी गाने सुनकर सोया करते हैं।
अब एक नया दौर आया है,
जिसने बचपन कि यादों को मिटाया हैं।
इसलिए तो हमने कहा,
अब एक नया दौर आया है।
- गौरी तिवारी
भागलपुर, बिहार
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