प्रेम की परिभाषा - by Madhuri Mishra "Madhu"


प्रेम की परिभाषा

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ऐ देव मेरे आज जान ले तू भी,

प्रेम करती हूँ सभी से यहाँ मैं भी,

जान सके ना कोई यहाँ किसी को,

पर मैं जानती हूँ यहाँ हर किसी को।


प्रेम की परिभाषा सिखा ना पाऊँगी,

पर प्रेम सभी से मैं तो करती जाऊँगी।

हे कान्हा! तुम ही सिखाना फिर आकर,

भूल गए हैं सगरे साथी जिस को तजकर।


इस दुनिया की सारी प्रीत है झूठी,

आज मैं भी हो गई खुद से ही रूठी।

कहाँ किसको मनाने अब मैं जाऊँगी, 

हे कान्हा! तेरे बुलाने पर ही मैं आऊँगी।


समय की अविरल धारा का चक्र यहाँ,

क्या यूँ ही इसी तरह से चलता जाएगा,

क्या कोई किसी को समझ ना पाएगा,

तुम समझाने फिर आ जाना हे कान्हा!


कर रही इंतजार तेरा मैं यूँ तक तक,

थकान मेरी कुछ यूँ ही बढ़ती जाती है,

समझ समझकर सबको जब थक जाती है,

तब याद तुम्हारी बरबस ही चली आती है।


चले आओ कान्हा तुम एक बार फिर से,

प्रेम प्रीत की डोर पकड़ आ जाओ फिर से,

यह दुनिया डूब रही फिर मझदार में देखो,

बताओ तो क्यों रूठ गए हो हम सब से।


क्षमा माँगते तुझसे ये ऑंसू कान्हा,

कुछ तो मोल दिला जाओ हे कान्हा!

मार्ग सही तुम चुनकर मुझको दे जाओ,

जीवन पथ पर जिससे चल पाऊँ ओ कान्हा!


- माधुरी मिश्रा "मधु"

लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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