हसरतें - by Madhuri Chitranshi "Madhu"
हसरतें
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चाँद उतरा करे गोद में नीर के,
हम खड़े ही खड़े बस निहारा करें।
वो मचलता रहे ख़ुद बहलता रहे,
हम पलकों पे आँसुओं को सँवारा करें।
ज्वार भाटे की लहरें भी छू ना सकीं,
वो जो पीड़ा छुपी थी हृदय में कहीं।
एक झटका मगर स्मृति का जो लगा,
सीप सारे समन्दर में लहरा गए।
मेरे मानस के नीरज़ तेरी गोद में,
आज छिपने चली हैं मेरी हसरतें।
खोल दो पंखुड़ी कुछ न बाकी रहे,
आज सृष्टि भी आँसुओं में बहने को है।
पलकों पर सँवरते दर्द के ये आँसू,
सागर की लहरों में समा जो गए तो,
ये धरती गगन, सृष्टि के सब नज़ारे यूँ
डूबेंगे कि क़यामत ब़रपा ही जाएगी।
- माधुरी चित्रांंशी "मधु"
नई दिल्ली
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