धर्म-कर्म - by Anand Kumar Mittal
धर्म-कर्म
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उड़ चले परिन्दे, भोर हुई,
दाना-पानी को खोजत हैं,
उठ जा मानव, आलस्य छोड़,
उषा, प्राची दिश आवत है।
वन्दन कर ले तू विधाता का,
जिसने ये नया 'प्रभात' दिया,
सूरज, चन्दा के साथ सखे,
तेरे मन नया प्रकाश दिया।
तेरे मात-पिता साक्षात 'प्रभु'
मानव-तन तुझको सौंप दिया,
जतन से ख़्याल रखा तेरा,
तेरा 'बचपन' तेरे साथ जिया।
वो बुजुर्ग हुए, तू बड़ा हुआ,
अब ख़्याल तू उनका रख लेना,
आदर-सत्कार कर उनका,
नित प्यार-बोल बोला करना।
पितृ कर्म, परिवार कर्म और
धर्म-कर्म सब करने हैं।
दायित्व समाजिक कर्मों का,
सब ईश-दया से करने हैं।
- आनन्द कुमार मित्तल
अलीगढ़, उत्तर प्रदेश
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