डगर - by Sandhya Seth


डगर

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डगर है अनजान मगर राह से

मेरी पहचान पुरानी लगती हैं,

साथ चले थे जो कल तक

बनकर हमसफ़र वो एक

कहानी लगती हैं।


सपना सुनहरा बनकर जो

आँखों मे बसा करते थे मेरी,

वही नहीं है साथ तो ये निगाहें

अब सूनी सूनी लगती हैं।

डगर है अनजान मगर राह से

मेरी पहचान पुरानी लगती हैं।


वो हाथ जो मुद्दत पहले

चलते रहे थे मुझको थामें,

आज भी मेरे हाथों की लकीरों

में उनकी निशानी रहती हैं।

डगर है अनजान मगर इस राह से

मेरी पहचान पुरानी लगती हैं,


जो गुलाब तुम्हारे तोहफे के

महका देते थे मेरी साँसो को,

हवा के झोंके में अब भी उन

फूलों की महक बसती हैं।

डगर है अनजान मगर इस राह से

मेरी पहचान पुरानी लगती है।


आगे बढ़ते गए जिंदगी के साथ

लेकिन ये तो तुम्हें भी पता है।

आज भी हमारे उन ठिकानों

पर वहीं बेबाक हँसी गूँजती हैं। 

डगर है अनजान मगर इस राह से

मेरी पहचान पुरानी लगती है।


आज भी मुसकुरा देते है दोनों

जब कोई दिल आशिकी का

ज़िक्र करता है।

साथ हों जाते है एक दूसरे के

आकर क्योंकि ये हमारी मोहबत

तो रुहानी लगती है।  


डगर है अनजान मगर इस राह से

मेरी पहचान पुरानी लगती है,

साथ चले थे जो कल तक मेरे

आज वो ही एक कहानी लगती है। 


- संध्या सेठ 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

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