झूठी प्रशंसा (कहानी) - by Chandan Keshri


झूठी प्रशंसा

-

रणभूमि में युद्ध चल रहा था और सेनापति को शत्रुओं ने मार दिया था, अब सेना की सारी बागडोर राजा जयप्रकाश सिंह को संभालनी पड़ी। युद्ध अपने चरम पर था कि तभी अचानक राजा जयप्रकाश सिंह पर तीरों की वर्षा हो गई, अचानक हुई इस घटना के कारण राजा बुरी तरह घायल हो गए। उनकी जान बचाने के लिए उन्हें किसी तरह वापस महल लाया गया। युद्ध में मिली हार के कारण उनका एक किला अब शत्रु के हाथ में चला गया। राजवैध ने सारी कोशिश कर ली, लेकिन अधिक खून बहने के कारण राजा जयप्रकाश सिंह भी स्वर्ग सिधार गए।


राजा जयप्रकाश सिंह की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र विजयप्रकाश सिंह को राजा बनाया गया। अब सवाल यह था की सेनापति किसे बनाया जाए?, क्योंकि यह एक महत्वपूर्ण पद था। इसका हल राज्य के सबसे विद्वान व्यक्ति व कुलगुरु आचार्य दीनदयाल ने निकाला। उन्होंने कहा की इसके लिए एक प्रतियोगिता करवाई जाए, जिसमें विजेता को सेनापति बनाया जाए। राजा विजयप्रकाश सिंह ने भी अपनी हामी भरते हुए कहा की यह प्रतियोगिता हमारे कुलगुरु के देखरेख में ही संपन्न हो।


प्रतियोगिता में कई तरह के कार्यक्रम रखे गए; जैसे तीरंदाजी, तलवारबाजी, घुड़सवारी इत्यादि। इस प्रतियोगिता में कई लोगों ने हिस्सा लिया, पर हर कार्यक्रम में केवल राज्य का एक सैनिक विक्रम सिंह और दूसरा राजघराने का तेजस्वी सिंह का ही बोलबाला रहा। दोनों एक से बढ़कर एक थे और हर विद्या में निपुण भी। कुलगुरु ने राजा विजयप्रकाश सिंह से कहा - "यह दोनों ही श्रेष्ठ हैं, इसलिए हम इन दोनों से तीन-तीन सवाल पूछेंगे, तीन में जिसका सबसे अधिक उत्तर सही होगा, उसे सेनापति बनाया जाएगा।" राजा ने भी हाँ कर दी। पहले प्रताप सिंह को बुलवाया गया और प्रश्न पूछना आरम्भ हुआ। पहले दो प्रश्नों का उत्तर उसने सही दिया। सभी लोग यह जानना चाह रहे थे की अंतिम प्रश्न का उत्तर वह सही दे पाता है या नहीं। उससे तीसरा प्रश्न यह पूछा गया कि इस राज्य में सबसे विद्वान व्यक्ति कौन है? उसने बिना समय गँवाए, तुरंत राज्य के कुलगुरु दीनदयाल जी का नाम ले लिया। वहाँ उपस्थित सभी लोग यह सोच रहे थे की उनका नया सेनापति उन्हें मिल गया है। लेकिन बिना एक से सवाल किए दूसरे को सेनापति कैसे बनाया जा सकता था? अतः तेजस्वी सिंह को बुलवाया गया और प्रश्न पूछना आरम्भ हुआ। उसने भी प्रथम दोनों प्रश्नों के उत्तर सही दिए। सभी लोग उसे बड़े गौर से देख रहे थे। अब तीसरे प्रश्न पूछने की बारी आई। उससे भी पूछा गया की राज्य में सबसे विद्वान व्यक्ति कौन है? वह राजा के स्वभाव को जानता था। उसने थोड़ा सोचा, फिर कहा की इस राज्य में महाराज विजयप्रकाश सिंह से विद्वान व्यक्ति कौन हो सकता है भला।


मानव का यह स्वभाव ही है की जो भी उसकी प्रशंसा करता है, वह उसे अच्छा लगने लगता है, फिर चाहे वह प्रशंसा झूठी ही क्यों ना हो। अपनी प्रशंसा सुनते ही राजा का मन भी गदगद हो गया, उन्होंने बिना कुछ सोचे-समझे तुरंत कह दिया की तेजस्वी सिंह ही इस राज्य का सेनापति होगा। राजा की बात को अनुचित कहने की हिम्मत किसी में भी नहीं थी, कुलगुरु सहित वहाँ उपस्थित वरिष्ठगण चाह कर भी कुछ ना कह सके।


इस फैसले के बाद एक तरफ दरबार के सभी लोग सोच में पड़े थे तो दूसरी तरफ तेजस्वी सिंह फुला ना समा रहा था। इधर प्रताप सिंह के मन में उदासी छाई थी की उसके सही उत्तर देने के बाद भी वह सेनापति ना बन पाया और वह एक सैनिक हीं रह गया, फिर भी उसने इसे अपनी नियती मानकर स्वीकार किया और यह निश्चय किया की यदि भविष्य में कभी भी उसे अपनी वीरता दिखाने का अवसर मिलेगा तो वह अपनी मातृभूमि की सेवा में अपना सर्वस्य न्यौछावर कर देगा।


समय बीतता गया। तेजस्वी सिंह हर बात पर राजा की झूठी प्रशंसा किया करता और राजा उसकी बातों से खुश होकर उसे कुछ ना कुछ इनाम दिया करते। राजदरबार के अन्य लोग राजा के इस व्यवहार से नाखुश रहा करते, लेकिन वे कर भी क्या सकते थे? ना वो तेजस्वी सिंह को राजा की प्रशंसा करने से रोक सकते थे, ना उस प्रशंसा को झूठा कह सकते थे और ना ही राजा को इनाम देने से रोक सकते थे। राजा तेजस्वी सिंह से इतने प्रसन्न रहने लगे की कई बार राजदरबार के लोग यदि तेजस्वी सिंह के विरुद्ध कुछ भी कहते तो राजा उन लोगों की बातों को सुनना तक नहीं चाहते थे। तेजस्वी सिंह ने राजा के मन में एक अलग ही स्थान ही प्राप्त कर लिया था। उसे अब खुद पर भी अभिमान होने लगा था। राजा ने उसके हाथों में कई महत्वपूर्ण कार्य दे दिए थे, जिससे उसकी शक्ति भी बढ़ गई थी।


राजदरबारियों में दरार पड़ गई, जहाँ एक ओर राजा और सेनापति थे तो दूसरी ओर अन्य दरबारीगण। इन सभी के समन्वय के बिना राज्य प्रगति के पथ पर कैसे चल सकता था?, हुआ भी कुछ ऐसा हीं। अभिमान में चूर तेजस्वी सिंह अब किसी भी कार्य के लिए किसी से पूछना या सलाह लेना भी आवश्यक नहीं समझता और सदा ही अपनी मर्जी की किया करता। हद तो तब हो गई जब उसने राज्य के लोगों पर भी अपनी धाक जमानी शुरु कर दी। वह आम जनता पर भी अत्याचार करने लगा। वह जनता से अतिरिक्त कर वसूलने लगा, अतिरिक्त कर ना देने वाले दुकानदारों की दुकानें बंद करने लगा, किसानों के कर ना देने पर उनके अनाज को जबरदस्ती लूटने लगा। सभी लोग उससे त्रस्त रहने लगे। यदि आम लोग न्याय के लिए राजा के सम्मुख जाना भी चाहते तो उन्हें सैनिकों के द्वारा महल के दरवाजे से ही वापस भेज दिया जाता। जनता के मन में राजा और उसके सेनापति के लिए हीन भावना उत्पन्न होने लगी। सभी लोग उनके खिलाफ होने लगे।


फिर पड़ोसी राज्य के राजा अपनी पूरी सेना के साथ राजा विजयप्रकाश सिंह के एक किले को जीतने के मकसद से किले की ओर आगे बढ़ने लगे। सूचना मिलते ही इधर भी पूरी सेना तैयार हो गई। युद्ध का बिगुल बजते ही राजा विजयप्रकाश सिंह भी अपनी पूरी शक्ति के साथ रणभूमि में कूद पड़े। सेनापति तेजस्वी सिंह भी सेना की अगुवाई करते हुए शत्रुओं पर भारी पड़ रहे थे। सैनिक प्रताप सिंह, जो कि सेनापति तो ना बन पाया था, परन्तु उसमें वीरता भरी हुई थी, वह भी रणभूमि में दुश्मनों को मारते हुए अपनी वीरता का परचम लहरा रहा था।


शत्रुओं पर जीत लगभग निश्चित थी, लेकिन अचानक राज्य की आम जनता भी रणभूमि में कूद पड़ी। कोई डंडा तो कोई कुछ और, जिसको जो मिला वही हाथों में लिए आ गए रणभूमि में। राजा खुश हुए की आम लोग भी इस युद्ध में उनका साथ देंगे, परन्तु अचानक उनके चेहरे का रंग ही उड़ गया। ये लोग अपने राज्य की सेना के खिलाफ ही लड़ने लगे, अपने राज्य के सैनिकों को ही मारने लगे। राजा विजयप्रकाश सिंह व अन्य सभी यह सोच में पड़ गए की यह क्या हो रहा है? उधर शत्रु राज्य के राजा के मन में फिर से जीत की उम्मीद जागने लगी। युद्ध पूर्णतः अलग रूप ले चुका था। आक्रोशित लोगों ने सेनापति तेजस्वी सिंह को मार दिया। राजा विजयप्रकाश सिंह अपने राज्य के लोगों के इस व्यवहार से स्तब्ध थे और परिस्थिति की गंभीरता को समझते हुए अपने पाँव पीछे कर लिए।


अब राजा विजयप्रकाश सिंह अपने एक महत्वपूर्ण किले को हार चुके थे। सेनापति तेजस्वी सिंह की मृत्यु के करण वे अत्यंत दुखी थे। मगर अपने किले और सेनापति को खोने से कहीं अधिक दुखी, वे अपनी प्रजा के इस व्यवहार से थे। वे केवल यही सोच रहे थे कि प्रजा के इस आक्रोश का कारण क्या है? यही सोचते-सोचते पूरी रात गुजर गई। उन्होंने यह सोचा की अब अगली सुबह वे स्वयं ही जनता के आक्रोश का कारण पता करने अपने राज्य की जनता के बीच भेष बदलकर जाएँगे। सूरज की पहली किरण के साथ ही वे अपने राजशाही वस्त्रों के स्थान पर आम जनता के वस्त्रों में बिना किसी को बताए महल से बाहर निकल गए। उन्होंने देखा की राज्य में हर ओर चहल-पहल थी, हर तरफ एक नई उमंग छाई थी। बाजारों में भी काफी भीड़ थी।


उधर राजमहल के लोगों को पता चल गया की राजा महल में नहीं है और उनलोगों ने राजा को हर तरफ खोजना शुरु कर दिया। इधर राज्य में घूमते हुए एक मिठाई की दुकान पर राजा की नज़र रुक गई, वहाँ मिठाई दुकानदार कह रहा था की एक मिठाई पर एक मुफ्त। राजा ने कुछ सोचा, फिर उस मिठाई दुकान पर जाकर पूछा की एक मिठाई पर दूसरा मुफ्त क्यों? दुकानदार मुस्कुराते हुए बोला - "पूरी राज्य के लिए जब इतनी खुशी का अवसर है, आजादी का अवसर है, तो क्या मैं एक मिठाई भी मुफ्त नहीं दे सकता।" राजा फिर बोले - "आजादी का अवसर? कैसे?" दुकानदार ने कहा की लगता है राज्य में नए हो, कल हमारे राज्य की जनता ने एक अत्याचारी को उसके कर्मों की सज़ा दे दी। अब हम सभी उसके अत्याचारों से मुक्त हो गए। राजा का मन विचलित हो गया। दुकानदार ने फिर कहा - "सेनापति जिस तरह सभी पर अत्याचार करता था, अतिरिक्त कर वसूलता था, दुकानें बंद करवा देता था, किसानों के अनाज लूट लेता था, छोटी-छोटी बातों पर किसी को भी कारागार भेज देता था, इससे हम सभी डरे हुए रहते थे। अगर हम न्याय के लिए राजा के पास भी जाते तो हमें महल के दरवाजे से ही वापस भेज दिया जाता था, राजा भी ऐसा की अपनी झूठी प्रशंसा पर राज्य की कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी एक अयोग्य के हाथों में सौंप दी। आज हम निडर हैं, आजाद हैं।" इन सब बातों को सुनकर राजा के नेत्रों से अश्रुधार बहने लगे। उसे खुद पर बहुत शर्मिंदगी महसूस होने लगी। दुकानदार ने पूछा - "क्या हुआ बंधु, रो क्यों रहे हो?" राजा के पश्चाताप के अश्रु बहते जा रहे थे, देखते ही देखते वहाँ काफी भीड़ जमा हो गई, सब यही सोच रहे थे की ये रो क्यों रहे हैं? तभी एक व्यक्ति ने कहा - "देखो! राजा विजयप्रकाश सिंह के महल का रथ इसी ओर आ रहा है।" रथ से स्वयं राजमाता सावित्री देवी अपने पुत्र को ढूंढने निकली थी, तभी अचानक उनकी नजर राजा पर पड़ी। एक माँ कभी अपने पुत्र को पहचानने में गलती नहीं कर सकती, चाहे उसका पुत्र किसी भी भेष में हो। वह तुरंत राजा के पास गई और कहा - "पुत्र! तुम यहाँ इन साधारण वास्त्रों में क्या कर रहे हो?" लोग यह जानकर स्तब्ध रह गए कि यही हमारे राजा हैं। राजा रोते ही रहे, फिर जनता से हाथ जोड़कर बोले - "मैं क्षमा के लायक नहीं, मुझे सजा मिलनी चाहिए।" भीड़ में से हीं एक व्यक्ति ने कहा - "आप एक अयोग्य के हाथों में राज्य के महत्वपूर्ण कार्य कैसे सौंप सकते हैं?" फिर दूसरे व्यक्ति ने कहा - "क्या आपने कभी प्रजा से उनका हाल-चाल जानना भी उचित नहीं समझा?" राजा ने रोते हुए कहा - "मैंने हर मोड़ पर गलती की, तेजस्वी सिंह ने मेरे मस्तिष्क को जैसे नियंत्रित ही कर लिया था। इतना नियंत्रित की मैं अपने प्रजा को ही भूल गया। मैं जीवित रहने के लायक ही नहीं।" राजा के अश्रुधार रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। तब मिठाई दुकानदार ने कहा - "महाराज! पश्चाताप के अश्रु से आपके सारे पाप धुल गए। अब आप फिर से एक नई शुरुआत करें, हम सभी आपके साथ हैं।" फिर सभी एक साथ कहने लगे - "हाँ महाराज! हम सभी आपके साथ हैं।" सभी लोगों ने एक स्वर में कहा - "महाराजा विजयप्रकाश सिंह की जय" और यह स्वर हर ओर गुँजने लगा। फिर राजमाता, राजा को अपने साथ लेकर महल लौट आई।


अगले दिन सभा बुलाई गई और सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया की विक्रम सिंह ही राज्य के नए सेनापति होंगे। नए सेनापति के नियुक्त होने से प्रजा में खुशी का माहौल था। इधर विक्रम सिंह को भी अपनी योग्यता का इनाम मिल चुका था।


अब एक प्रतिभावान राजा और एक योग्य सेनापति के नेतृत्व में राज्य प्रगति के पथ पर अग्रसर हो चला।


- चन्दन केशरी

झाझा, जमुई (बिहार)

No comments

Powered by Blogger.