दुनिया एक रंगमंच - by Saroj Maheshwari
दुनिया एक रंगमंच
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दुनिया के इस सुंदरतम मेले में,
रंगमंच प्रभु ने अनोखा सजाया है।
किरदार निभाने यहाँ आए हम तो,
कठपुतली हम सब को बनाया है।
रिश्तों का फर्ज़ बताया जगदीश्वर ने,
भूल गम अपना, औरों को हँसाना है।
एक पीढ़ी को किरदार निभाना अपना,
फिर दूजे को नेपथ्य में छिप जाना है।
कोई मानवता का सच्चा पुजारी है,
कोई धूर्त पाखंडी बनकर आता है।
कोई तो पद, धन, एश्वर्य के मद में,
धर्म, कर्म सब कुछ बिसर जाता है।
अधरों पे मुस्कान, नयनों नीर लिए,
ख्वाहिशों की बली कोई चढ़ाता है।
पग-पग रंग बदलती इस दुनिया में,
गिरगिट-सा रूप कोई धर लेता है।
जगमग करता यह जग रंगमंच है,
जन-मन को बहुत ही लुभाता है।
जोकर बना यहाँ हर एक क़िरदार,
साहब! झूठा ही खेल तो रचाता है।
नाच नचाकर सब खेल खिलाकर,
ईश्वर हमको यहाँ खूब नचाता है।
कथावस्तु की इति श्री होती जब,
जीवन पर्दा तो प्रभु ही गिराता है।
- सरोज माहेश्वरी
पुणे, महाराष्ट्र
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