गुरूदेव - Deepak Sharma
गुरूदेव
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सतगुरूदेव कैसे तेरा वर्णन लिखूँ।
चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम लिखूँ।
आप ही गुरूदेव मेरे जीवन दाता,
उपकार का कैसे मैं आभार लिखूँ।
रहमत की तेरी मैं क्या बखान करूँ।
गिनूँ उपकार तो सुबह से शाम करूँ।
ऋण चुका सकता नहीं गुरूदेव तेरा,
चाहे तन, मन, धन, सब अर्पण करूँ।
वेदों के मंत्र, गीता का ज्ञान तुम।
गंगा का स्नान, चारों धाम तुम।
बिन माँगे ही करते हर मुराद पूरी,
दया के सागर, करूणा निधान तुम।
मेरे जीवन के आधार तुम।
मेरी हर पूजा, हर जाप तुम।
तेरे बिना मेरा अस्तित्व क्या,
मेरे रोम रोम में व्याप्त तुम।
मेरा तन, मन, धन प्राण तुमसे।
मेरा चाल, चलन ईमान तुमसे।
तेरी सत्ताम से ही मैं संचालित,
मेरा धर्म, कर्म,अरमान तुमसे।
अशरण को दास बनाया तुमने।
डूबती नैया को पार लगाया तुमने।
हर लेते हो मेरे हर संताप गुरूदेव,
बुझे हुए ‘दीपक’ को जलाया तुमने।
- दीपक शर्मा
टिमरनी, मध्य प्रदेश
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