घूँघट के पट खोल - by Sanjay Kumar Rao

 


घूँघट के पट खोल

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घूँघट के पट खोल रे साथी,

घूँघट के पट खोल ।।


मोहजाल से घिरी डगरिया,

अटकत भटकत चले सँवरिया ।

होवे रे मन डोल रे साथी,

होवे रे मन डोल ।।

घूँघट के पट खोल रे साथी,

घूँघट के पट खोल ।।


इच्छा अगणित चाह अपरिमित,

लालच का संसार असीमित ।

मन की आँखें खोल रे साथी,

मन की आँखें खोल ।।

घूँघट के पट खोल रे साथी,

घूँघट के पट खोल ।।


शान दिखावा भरा जमाना,

कारूं का हो जैसे खजाना ।

भले कर्ज का खेल रे साथी,

भले कर्ज का खेल ।।

घूँघट के पट खोल रे साथी,

घूँघट के पट खोल ।।


देखादेखी चाह सजे है,

मन में नव अरमान पजे है ।

मन को कर कंट्रोल रे साथी,

मन को कर कंट्रोल ।।

घूँघट के पट खोल रे साथी,

घूँघट के पट खोल ।।


खानपान आचार बदलते,

जीने का आधार बदलते ।

मूल्य जरा तू तोल रे साथी,

मूल्य जरा तू तोल ।।

घूँघट के पट खोल रे साथी,

घूँघट के पट खोल ।।


भूल पुरातन संस्कृतियों को,

लगे गहे क्यूँ विकृतियों को ।

जीवन है अनमोल रे साथी,

जीवन है अनमोल ।।

घूँघट के पट खोल रे साथी,

घूँघट के पट खोल ।।


- संजय कुमार राव

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश 

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