श्री राम वन गमन - by Madhusudan Tiwari
श्री राम वन गमन
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कैकई के हट काम ना आते, ना प्रभु राम वनवास ही जाते।
भवसागर को पार तारने, ना तुलसी मानस रच पाते।।
ऐसे दुर्लभ योग कभी जब, युग में बनते देर सबेर।
कैकई के दुर्भाग्य बड़े जो, धिक-धिक करते रहते टेर।।
प्रेम के रस को मीठी वाणी, भक्ति के रस में डूबे प्राणी।
नवधा भक्ति शबरी से जानें,प्रभु के शरण सब ग्रन्थ बखाने।।
भक्ति के रस में ऐसी डूबी, सामने रख दी फल के ढेर।
शबरी जैसे भाग्य कहाँ, जो प्रभु ने खाए जूठे बेर।।
सीय लखन संग गंगा तीरे, केवट देखें आए नियरे।
कठोती भर कर जल ले आए, मुदित हृदय जो प्रभु को पाए।।
एक बूंद सागर को मिलकर, भरता जल का कुबेर।
केवट जैसे भाग्य कहाँ जो, प्रभु के पखारे पैर।।
सकल प्रसंग पढ़ लिख बाँचे, प्रभु वन गमन के घटना जाँचे।
भजे निरंतर भक्ति भाव से, लीन मगन संग खुद को जाँचे।।
मानस में मर्मग्य लीन हो,रस हर्षाते कह कथा प्रसंगा।
अमृत सी वर्षा जब होती, खुद खो जाते प्रभु के संगा।।
हम बस लिखते राम-राम हैं, फेरे देते हनुमान हैं।
केवल राम अनंत सुख सागर, जो डूबा उसको ही भान हैं।।
- डॉ० मधुसूदन तिवारी
मंडला, मध्य प्रदेश
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