जीवन को आलोकित रखना - by Prof. N. Shanti Kokila
जीवन को आलोकित रखना
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जीवन को आलोकित रखना,
यह सबसे बड़ी चुनौती है।
है सरल नहीं चलना पथ पर,
कंटक पुष्पों से भरा हुआ।
आलोक सदा ही रहता है,
बादल झंझा से भरा हुआ है।
पथ में तम है चहुँ ओर निशा,
सब सोए चाँद सितारे हैं।
दीपक जो थे कुछ जला लिए,
वे भी मारूत से हारे हैं।
सुरज के घर का पता नहीं,
बिखरे सब हीरे मोती है।
यह अंधकार है जगती का,
सबको दिग्भ्रमित करता है।
वैभव विलास के चित्र दिखा,
मन को आकर्षित करता है।
अगणित राजा निर्धन आकर,
इस अंधकार में फिसले है।
ऋषियों-मुनियों के पावन तप,
कुछ रंभा़ओ ने कुचले है।
बचना है बहुत कठिन यौवन,
धन की वर्षा जब होती है।
कितने लालच प्रभ़ोलन है,
धन रूप और मधुशाला के।
सुख सपने लिप्साएँ इसके,
दिखलाती वैभव हालो के।
कितने घातक षड्यंत्र इसे,
घेरे हैं बरछी भालो से।
संकट में रहता है प्रतिपल,
हो कैसे रक्षा न्यालो से।
कभी इन्द्र धनुष आ जाता है,
कभी तृष्णा सपने बोती है।
है जाल शिकारी लिए हुए,
मछली सा इसे फँसाने को।
कुछ भ्रष्ट शक्तियाँ आतुर है,
सत पथ से इसे हटाने को।
इस चक्रव्यूह से बाहर अब,
निकले कैसे लाचारी है।
है चारों ओर धनुर्धारी,
जो घातक अत्याचारी है।
उनके होंठों पर कुटिल हँसी,
हिंसा लख करुणा रोती है।
अंधियारे में जन्मे हैं हम,
अंधियारे में मरना होगा।
ऐसा लगता है इस जीवन को,
विद्रोह बड़ा करना होगा।
यह जीवन सुरक्षित हो अपना,
पुष्पों में जैसे गंध बसी।
सब छोड़ कपट छल कामुकता,
पावन जीवन उन्मुक्त हँसी।
- प्रो० एन० शान्ति कोकिला
बेंगलूर, कर्नाटक
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