रूह - by Anuradha Priyadarshani


रूह

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रूह जो हमको हमसे मिलाए,

सत्य के पथ का अनुसरण करे।

वही है दिव्य रूह ईश्वर सम,

रूह ही चेतना है इस शरीर में।


रूह से जो रिश्ता बन जाता है,

वही होता है सच्चा रिश्ता गहरा।

ये तो नश्वर है इस संसार में,

अग्नि, पवन न कुछ बिगाड़ सके।


सबके भीतर है पवित्र रूह वास,

जो है ईश्वर का एक अंश अहम।

जब तक वो चाहे रूह घूमती,

इस कालचक्र के भंवर जाल में।


जो रूह को ईश्वर की कृपा मिले,

छूट जाएँ सारे ही बंधन जगत के।

मुक्ति मिल जाती पवित्र रूह को,

जो भी करें निश्काम कर्म।


प्रेम भाव, श्रद्धा, दया और ममता,

ये सब रूह को देते हैं आत्मबल।

कर्म चक्र जो पूरी करती रूह,

ईश्वर पद को सहज ही पा जाती।


- अनुराधा प्रियदर्शनी

प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

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