गीत की मादकता - by Anju Saxena

 

गीत की मादकता

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गीत तुम्हारा ऐसा मादक,

जैसे मादक पावन बसंती।

अधरों की प्याली से निकले,

ऐसे स्वर जैसे निकली हो,

शीतल धारा मधुर प्रेम की।

गीत तुम्हारा.....


स्वर की मीठी झनकारों ने,

कानों में घोली मिश्री-सी।

अंजानी संभावनाओं ने,

छुआ हृदय को ऐसे जैसे,

तपे धूप से नव फूलों को,

छूती जलधारा सावन की।

गीत तुम्हारा.....


मधुर तुम्हारी प्रेम कल्पना, 

झरती है इस प्रेम गीत से।

जैसे गिरती हो शीतल ओस की,

बूँद मधुप-सी किसी पात पर,

देती उसको नई जान-सी।

गीत तुम्हारा.....


- अंजू सक्सेना

दिल्ली

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