लहरें - by Shailendra Sagar
लहरें
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ये माना कि ये रात लंबी बहुत है,
मगर इसके रोके सहर कब रुकेगी।
बहुत ही घना है अँधेरा मगर ये,
अँधेरा छँटेगा शमां जब जलेगी।
समंदर को हम ठोकरों पे हैं रखते,
जो अपनी पे आएँ तो पर्वत उठा लें।
जो ख़म ठोक कर पाँव अपने जमा दें ,
भला किसमें दम है उसे जो हटा ले।
डराएगा क्या हमको सैलाब ए दरिया,
इन्हीं लहरों पे अपनी कश्ती चलेगी।
हमीं ने समुंदर पे हैं बांध बांधे,
हमीं ने हैं तैराए पानी में पत्थर।
हमीं ने जटाओं में गंगा को धारा,
हमीं ने धरा है धरा अपने सर पर।
हमीं ने गरल को है अमृत बनाया,
हमारा भला ये बला क्या करेगी।
मुकाबिल हुए कितने तूफान हमसे,
मुकद्दर से लड़ना शगल है हमारा।
हमें तो उतरना है गहराइयों में,
हमें रास आया भला कब किनारा।
ये भँवरें ये लहरें ये मौजे हवादिस,
इन्हीं से उबर के तो मंजिल मिलेगी।
ये माना कि ये रात लंबी बहुत है,
मगर इसके रोके सहर कब रुकेगी।
बहुत ही घना है अँधेरा मगर ये,
अँधेरा छँटेगा शमां जब जलेगी।
- शैलेन्द्र सागर
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