जीत - by Sandhya Tiwari

जीत

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जग में जीतना सब चाहे,

हार किसी को पसंद नहीं।

हार के बिना सब ये समझो,

जीत भी कभी संभव नहीं।।


 सम्मान बड़ों का होता जहाँ,

बेटियाँ पूजी जाती जहाँ।

लड़के-लड़की का भेद नहीं,

मुस्कान जीत की होती है वहीं।।


जहाँ पर्यावरण की रक्षा हो,

जहाँ जीव जंतु सुरक्षित हो।

जहाँ जल की हिफाजत होती हो,

जहाँ नफरत नहीं पनपती हो।।


ऐसा संसार बनाए हम,

सब दिलों को जीत जाएँ हम।

ऐसी जीत का आवाहन करें,

मुख पर सबके मुस्कान रहे।।


जीत उस दिन हमें मिल जायेगी,

अनुशासित जब जन जन होगा।

खुरापाती विचारों से,

मस्तिष्क सभी का मुक्त होगा।।


जीत रणभूमि में भी होती है,

पर मुस्कान गायब कहीं होती है,

कहीं का दीया बुझ जाता है,

कहीं रात अंधेरी होती है।।


लालच का सब खेला है,

सब पा जाने का नतीजा है।

जीत के भी हम हैं हारे हुए,

स्पर्श अपनों का पाने को तरस रहे।। 


चाहत की चाह तो देखो जरा,

रक्षक पर अपने वार किया।

जीत हासिल की जमीनों पर,

मृतक ज्यादा और लकड़ियाँ कम।।


सृष्टि रचियता है चतुर बड़ा,

खेल मुस्का के सबका देख रहा।

मजबूरी हम सबकी झलक रही,

जीत के भी हमें हार मिली।।


- संध्या तिवारी

फरीदाबाद, हरियाणा

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