कैसी होती है माँ - by Digvijay Singh


कैसी होती है माँ

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कदम कदम पर हौसला बढाकर

पथप्रदर्शक बनती है माँ,

भले ही सामने हो लाखों दुश्मन

 रक्षक सदा बनती है माँ!

दीपशिखा बन जलकर ही माँ

रौशन करती है सदा ही राहें,

गलत सही का भेद दर्शाकर

समीक्षक होती है प्यारी माँ,

स्नेह सुधा सम रस बरसा कर

परिपूर्ण होता है माँ का आँचल!

चाहे लाख बवंडर हो मगर न

होने देती है कोई हलचल,

अवतार पुरुष भी कभी नहीं

माँ को परिभाषित कर सकता है!

विशुद्ध प्रेम के अँसुवन से पोषित

 करती है माँ होके निश्छल,

माँ दरिया है प्यार का,

सदा संतान के लिए होती है सजल!


- दिग्विजय सिंह

समस्तीपुर, बिहार

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