वीर सावरकर - by Chetna Agrawal
वीर सावरकर
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जब आँखों से आग बरसती हो,
श्रृंगार नहीं लिख सकती हूँ।
जब धरती माँ की आँख हो नम,
मल्हार नहीं लिख सकती हूँ।
लंदन से उनकी हुई वकालत,
"बड़े बाबू" उनको सब कहते थे।
खबरें अखबारों में लिखते थे,
भारत से प्रेम वो करते थे।
देखी न गई अंग्रेज़ों से देशप्रेम की चिंगारी ,
मिली काले पानी की उनको सज़ा भारी।
बेड़ियों में उन्हें जकड़ते थे,
कोल्हू में बैल से पिसते थे।
चलने फिरने की क्या बात कहूँ ?
मल मूत्र भी त्याग न सकते थे,
और हर दम कोड़े पड़ते थे।
लहू ही लहू टपकता था,
घावों को कैसे सहते थे।
माथे पे शिकन ना आती थी,
हँस कर हर जुल्म को सहते थे,
बस वंदे मातरम कहते थे।
दर्द भरी उन रातों में,
चाँद से बातें करते थे।
कल्पनाओं के आकाश में,
सारी रात विचरते थे।
पंख उन्हें लग जाते थे,
वो ऊँची उड़ानें भरते थे।
हजारों कविताओं से वो,
रंग दीवारों में भरते थे।
क्रांति की आग धधकती थी,
भीतर ही भीतर सुलगते थे।
कविता और क्रांति का,
अद्भुत समन्वय वो करते थे।
एक व्यक्ति नहीं विचार हो तुम,
सीमित नहीं विस्तार हो तुम।
चिंगारी नहीं अंगार हो तुम,
तप कर निकले स्वर्णहार हो तुम।
हे शिल्पकार! हे योद्धा महान!
मत्यु भी तुमसे हारी है ।
हम सब कितने आभारी है।
कण+कण है तुम्हारा, देश को समर्पित ।
छण-छण है तुम्हारा, देश को अर्पित।
तुमको है वन्दन! करते अभिनन्दन!
अफ़सोस रहे, इनाम से तुम वंचित।
श्रद्धांजलि तुम्हें अब हो अर्पित।
सुनो साथियों,
समय नहीं है यह सोने का,
अब तो कुछ जग जाना तुम।
विदा हो गये जो मातृभूमि से ,
श्रद्धासुमन उन्हें चढ़ाना तुम।
श्रद्धासुमन उन्हें चढ़ाना तुम।
- चेतना अग्रवाल
अहमदाबाद, गुजरात
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