मंजिल - by Mamta Richhariya


मंजिल

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मंजिल खड़ी है बाँह पसार,

तुम आकर खोलो मेरे द्वार,

रखो लगन तुम अपने अंदर,

पा लो फिर सारा संसार।


मुश्किलें भी आएँगी हजार,

काँटो से राहें होंगी गुलजार,

सब कदमों तले रौंदते जाना,

चट्टानों-सा तुम करना वार।


बढ़ना होगा तुम्हें अकेले,

छोड़ना होगा स्वप्न सुनहरे,

बनना होगा अडिग हिमाला,

कदम कभी जो पीछे न ले।


निर्झर इस मन को मोहेंगे,

तरुवर छाया बनके डोलेंगे,

सुंदरता में तुम खोना नहीं,

उपवन भी मन को तोडेंगे। 


न बाधाओं से घबराना तुम,

न सुंदरता में खो जाना तुम,

बढ़ते ही रहना अपने पथ पर,

अपनी मंजिल पा ही लेना तुम।


- ममता रिछारिया

टिमरनी, मध्य प्रदेश

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