माया या धाम - by Rajesh Shrivastava
माया या धाम
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हम बंदे बाशिंदे, छोटे शहर के
कितने एकाकी हैं, घर छोड़ कर के
साधन प्रसाधन सब जोड़ कर के
कितने एकाकी हैं, घर छोड़ कर के
घर से निकले थे सब व्यथा दबा के
सोंच में था, लौटेंगे खूब पैसा कमा के
हम भी कोई चीज़ है, ये सिक्का जमा के
पर माया मिली न राम, ये धुनी रमा के
क्या मिला निज मिट्टी से मुँह मोड़ कर के
कितने एकाकी हैं, घर छोड़ कर के....
जब पहली बार अपनी चौखट को लाँघ
निकले पूरी करने, जवाँ जिंदगी की माँग
आँख में न आँसू दिखे, करते रहे ये स्वाँग
तन्हा होते ही टूट गया आँसुओं का बाँध
बन गए परदेशी, सबका दिल तोड़ कर के
कितने एकाकी हैं, घर छोड़ कर के....
माता - पिता सबने दी आशीष शुभकामनाएँ
कठोरता से दमन कर निज द्रवित भावनाएँ
क्योंकि पुत्र की उन्नति में कोई बाधा न आए
हम भी निकल पड़े कि चलो कर्तव्य निभाएँ
सच्ची खुशी कहाँ मिली है माया जोड़ कर के
कितने एकाकी हैं, घर छोड़ कर के.....
मेरे जाने के बाद, खामोशी का साया होगा
मम्मी-पापा में भी बात कम हो पाया होगा
हर ओर अकेलापन उन्हें काटने आया होगा
खाने के टेबल पर भी, आँसु छुपाया होगा
समय उनका बीता होगा मन मरोड़ कर के
कितने एकाकी हैं, घर छोड़ कर के.....
गृह त्याग जो करो, तो राम-सा उद्देश्य कोई हो
पालना हो तुम्हें, मातृभूमि का आदेश कोई हो
मन में कल्याण की भावना, आवेश कोई हो
कर्मभूमि भी जननी है, जो भी प्रदेश कोई हो
अयोध्या, गोकुल, द्वारिका सब को विभोर कर के
कितने एकाकी हैं, घर छोड़ कर के.......
- राजेश श्रीवास्तव
बैंगलोर, कर्नाटक
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