मुक्तिबोधि दोहे - by Amrendra
मुक्तिबोधि दोहे
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शूट-बूट तुम पहिन लिये, खुद से बने नरेश।
बाप ठंढ से ठिठुर रहे, बेटा घुमे बिदेश।।
खाने को खर्ची नहीं, दरवाजे पर नाच।
जन्मदिन पर लुटा दिया, शेष धन भी आज।।
नकल किये पर अकल नहीं, दिमाग में घुस गई रेत।
दिखावे में अमल नहीं, कितने बिक गए खेत।।
दिन-रात लोग जप रहे, बेरोजगारी की जाप।
पर चर्चा नहीं कर रहे, है ये पूँजीवाद की छाप।।
ऊपर बैठा देख रहा, इसी राज में नाश।
आँख मूँद बैठा रहो, होगा सत्यानाश।।
संघर्ष से मुख फेरे और अवसरवाद से प्रीत।
ऐसे जन को जानिए, है सबसे बड़ा ये नीच।।
जाती-मजहब से नेह करे, बोली बोले मीठ।
ऐसे से बचकर रहिये, ये खंजर मारे पीठ।।
अपनी हक से जो हटे और पीठ दियो दिखाय।
कुक्कुर से नीचे गिरे,भले न दुम हिलाय।।
जो वैज्ञानिक चिन्तन करे, समाजवाद कि खास।
हर जुल्म से वो टकराएँगे, है क्रान्ति की उन्हीं से आस।।
आगे हरदम बढ़ते रहो, हर भेद-भाव मिटाय।
जुल्मों-सितम मिट जाएगा, ऐसी व्यवस्था दो लाय।।
शाम्यवाद पर चर्चा करो और वर्ग संघर्ष की बात।
मुक्ति की अब तक नहीं, इससे बड़ी सौगात।।
क्रांति के पथ पर आओ, है शोषक संग संग्राम।
शोषित जन आगे बढ़ो, ले मुक्ति का पैगाम।।
- अमरेन्द्र
फतुहा, बिहार
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