सच्ची मित्रता (कहानी) - by Kundan Keshri
सच्ची मित्रता
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ये कहानी है दो बालक रामू और सुशील की। रामू एक प्रतिष्ठित परिवार से था, जिसकी समाज में काफी मान-मर्यादा थी। उसके पिता की अपनी कम्पनी था। उसका परिवार धन-दौलत से परिपूर्ण था और किसी भी तरह की कोई कमी नहीं थी। सभी तरह से परिपूर्ण होने के कारण सुशील को कभी किसी चीज की कमी ना रही। उसकी शिक्षा भी शहर के एक प्रतिष्ठित विद्यालय में हो रही थी। इधर सुशील एक गरीब परिवार से था, वह एक झोपड़ीनुमा घर में रहता था। उसके पिता मजदूर थे और कड़ी मेहनत करते थे। उसके परिवार की आर्थिक स्थिति भी अत्यंत दयनीय थी, दो वक्त की रोटी भी बहुत ही मुश्किल से नसीब होती थी। रामू उसके घर से कुछ दूरी पर स्थित एक सरकारी विद्यालय में पढ़ता था।
दोनों की स्थिति में आसमान-जमीन का अंतर था। लेकिन दोस्ती यह सब नहीं जानती, दोस्ती अमीरी-गरीबी नहीं बल्कि मन देखती है। जिसके साथ मन मिल गया, उसके साथ दोस्ती हो गई। सुशील और रामू की दोस्ती भी बहुत अटूट थी। क्रिकेट हो या फुटबॉल, दोनों हर शाम एक साथ खेलते थे। दोनों में से कोई भी दूसरे के बगैर एक दिन भी नहीं रह सकते थे। रामू जानता था कि सुशील के परिवार की आर्थिक स्थिति क्या है, लेकिन उसमें तनिक भी जलन की भावना ना थी। सुशील को भी कभी अपने धन-दौलत का अभिमान नहीं था। सुशील के पिता भी एक अच्छे व्यक्ति थे, उन्हें उन दोनों के साथ खेलने में कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन उसकी माँ सुनीता को यह पसंद नहीं था, वह इसके लिए हमेशा सुशील को डाँटा करती थी।
सुशील हर खिलौने भी अपने पिता से जिद कर 2 खरीदवाया करता था, ताकि वह 1 खिलौना अपने दोस्त को दे सके। सुशील के पिता अपने बेटे को इसके लिए कभी मना नहीं करते थे, लेकिन इस विषय में उसकी माँ सुनीता के विचार उसके पिता के विचार से पूरी तरह विपरीत थे। सुनीता उसे हमेशा रामू के साथ रहने के मना करती थी। दोनों साथ में खेलते तो वह रामू को डाँटती थी और वहाँ से भगा देती थी। रामू कभी भी इसके लिए कभी बुरा नहीं मानता था और अपने घर चल जाता था। मगर उन दोनों को कोई चाह कर भी अलग नहीं कर सकता था।
समय बीतता गया और सुशील को प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद उच्च शिक्षा के लिए शहर से बाहर भेज दिया गया, वहीं रामू सुशील के पिता की कम्पनी में काम करने लगा। यहाँ रामू काम करता था और वहाँ सुशील पढ़ाई करता था। सब कुछ अच्छे से चल रहा था कि तभी अचानक सुशील के पिता की मृत्यु हो गई। सुशील को इसकी खबर मिलते ही वह तुरंत ट्रेन से अपने घर आ गया। घर के बाहर ही उसे रामू भी मिल गया, वह रामू को देखते ही उसके गले से लग गया और रोने लगा। रामू के आँखें तो पहले से ही नम थी, उसकी आँखों से भी आँसुओं की धारा बहने लगी। फिर सुशील रोते-रोते अपने घर के अंदर गया, वहाँ मातम पसरा था। पिता के गुजर जाने का दुख सुशील को खाए जा रहा था। सुशील और सुनीता दोनों अकेले से महसूस कर रहे थे।
अब सुशील ने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी और वह अपने पिता की कम्पनी को संभालने लगा था। चुँकि रामू भी उसकी कम्पनी में ही काम करता था, इसलिए दोनों की दोस्ती एक बार फिर बढ़ती जा रही थी। रामू उस कम्पनी का एक योग्य कर्मचारी होने के साथ-साथ सुशील का दोस्त होने के कारण उस कम्पनी में काम करने वाले अन्य कर्मचारी रामू से जलते थे। सुनीता को तो रामू शुरू से हीं पसंद नहीं था। वह सुशील से रामू को कम्पनी से निकालने के लिए कहती थी, लेकिन सुशील भला अपने दोस्त को कम्पनी से कैसे निकल सकता था।
सुशील नई सोच के साथ काम करता था तथा हर काम में अन्य लोगों का सुझाव भी लेता था। रामू ने भी उसे कई तरह के सुझाव दिए। उसके सुझाव सुशील को बहुत पसंद आए तो उसने रामू की बात को मान लिया। उसने रामू के अनुसार व्यापार बढ़ाने के लिए नए-नए तरीकों का उपयोग करना शुरु कर दिया। उसने अपने व्यापार को डिजिटल रूप दे दिया और ऑनलाइन ही व्यापार बढ़ाने लगा। कम्पनी का प्रचार-प्रसार भी आधुनिक तरीके से करने लगा। इसका नतीजा यह हुआ की रामू के सुझाव और सुशील के देख-रेख में उसकी कम्पनी नई ऊँचाईयों को छूने लगी। कम्पनी तरक्की करने लगी और व्यापार बढ़ने लगा। कम्पनी का मुनाफा भी कई गुणा बढ़ गया। आवश्यकतानुसार उसके कर्मचारी भी अधिक समय तक काम करने लगे, जिसके लिए कर्मचारियों को अधिक वेतन भी मिलने लगा। रामू के सुझाव की बात सुनीता को भी पता चली, लेकिन उनके स्वाभाव में तनिक भी परिवर्तन नहीं आया, वह अब भी रामू को पसंद नहीं करती थी।
एक सुबह सुशील का एक रिश्तेदार निर्मल उसके घर पर आया, जो कि एक प्रतिष्ठित व्यापारी भी था। उसने सुशील से कहा की यदि हम दोनों साथ मिलकर काम करें तो हमारा व्यापार और बढ़ सकता है। सुशील हमेशा सोच-समझ कर कार्य करता था तथा अन्य लोगों से सुझाव भी लेना नहीं भूलता था। सुनीता ने सोचा की दोनोें यदि साथ में काम करे तो तरक्की कई गुणा बढ़ जाएगी। सुशील ने निर्मल से इस विषय में सोचने के लिए समय माँगना चाहा, लेकिन सुनीता ने उसे बीच में ही रोककर इसके लिए हामी भर दी। सुशील कुछ ना बोल पाया।
कम्पनी के अब दो मालिक हो गए, अब सुशील निर्मल के साथ साझेदारी में काम करने लगा। कम्पनी में निर्मल के साथ उसका मुंशी सुन्दर भी काम करता था। निर्मल और सुन्दर दोनों को यह बात अच्छी नहीं लगती थी कि रामू एक छोटा कर्मचारी होने के बावजूद सुशील के इतने करीब है। निर्मल और सुन्दर दोनों अपने नाम के ठीक विपरीत थे, दोनों के मन में ही खोट था। वे दोनों भी रामू को जलन की भावना से देखने लगे। दोनों को जब भी मौका मिलता तो सुशील के सामने रामू की बुराई करना नहीं छोड़ते थे। काम के कारण निर्मल का सुशील के घर आना-जाना बढ़ गया। वह सुनीता से भी रामू की बुराई करता और रामू को नौकरी से निकलवाने की बात कहता तो सुनीता कहती की मैं तो सुशील तो यह कहते-कहते थक चुकी हुँ, लेकिन वह मेरी सुनता कहाँ है?
निर्मल और सुन्दर अपनी कम्पनी में ही बने माल की कालाबाजारी करने लगे। दोनों मिलकर सुशील से धोखा कर रहे थे तथा वहाँ के कुछ कर्मचारियों को भी उन्होनें अपने साथ मिला लिया। वे ट्रक को पीछे के रास्ते से कम्पनी के अंदर लाते और उसमें माल भरकर उसे पीछे के रास्ते से ही ले जाते थे। एक दिन वे ये काम कर हीं रहे थे कि उनको रामू ने देख लिया और उनलोगों ने भी रामू को देख लिया और उसे पकड़ने के लिए भागे। रामू भी वहाँ से भागा, लेकिन अन्त में उनलोगों ने रामू को पकड़ लिया। रामू को खम्भे में बाँधकर दोनों सुशील के पास चले गए।
सुशील को उन लोगों ने बताया की रामू कम्पनी के माल की कालाबाजारी कर रहा था। उसने ट्रक को कम्पनी के पीछे के रास्ते से अंदर लाया था और उसमें कम्पनी का बना माल भरवा रहा था। उसके अन्य साथी तो भाग गए लेकिन हमने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया है। सुशील यह सब सुनकर स्तब्ध हो कर बोला - "मैं रामू को बचपन से जान रहा हुँ, वह ऐसा नहीं कर सकता।" निर्मल ने तुरंत बोला - "अगर विश्वास ना हो तो खुद चलकर देख लो।"
निर्मल और सुन्दर दोनों सुशील को रामू के पास ले गए, जहाँ उन्होनें रामू को बाँध रखा था, साथ ही सुनीता को भी फोन कर वही बात बताई और तुरंत आने को कहा। सुशील अपने मित्र को बंधे हुए देखते हीं उसकी रस्सी खोलने लगा। इससे पहले की रामू कुछ बोलता, निर्मल ने बोला - "रामू ने तुम्हें धोखा दिया है, यह तुम्हारे सामान की कालाबाजारी करता है। देखो! ट्रक भी यहीं है। ये रामू आस्तिन का साँप है।" रामू ने बोला - "सुशील! तुम्हें धोखा मैनें नहीं, इनलोगों ने दिया है।" इतने में सुशील की माँ भी वहाँ आ गई। निर्मल ने फिर कहा - "यह तो वही बात हो गई, उल्टा चोर..." रामू ने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा - "सुशील! मेरी बातों पर विश्वास करो। मैं गरीब हूँ, गद्दार नहीं।" सुनीता ने कहा - "मुझे तो ये शुरू से ही ऐसा लगता था। इसे तो जेल भेज देना चाहिए।" रामू ने कहा - "सुशील! तुम तो मुझे बचपन से जानते हो, तुम तो मेरा विश्वास करो।" निर्मल ने कहा - "मैं अभी पुलिस को फोन करता हुँ।" सुशील ने कहा - "नहीं! पुलिस को फोन मत करो।" निर्मल ने कहा - "तो क्या करें? इस धोखेबाज को तो अब कम्पनी में नहीं रख सकते।" सुनीता ने कहा - "तो इसे कम्पनी से निकाल देना चाहिए।" सुशील अब कर भी क्या सकता था? उसे मजबूर होकर रामू को कम्पनी से निकालना पड़ा।
सुशील की आँखें नम थी और वह यही सोच रहा था कि रामू ऐसा नहीं कर सकता। इधर रामू को इस बात का दुख नहीं था की उसकी नौकरी चली गई, बल्कि इस बात का दुख था की उसे इस तरह फँसाए जाने से सुशील उसके बारे में ना जाने क्या-क्या सोच रहा होगा। अब वह दूसरी कम्पनी में काम करने लगा। कई बार वह सुशील को सच बताने की सोचता, पर वह यह सोचकर रुक जाता की क्या सुशील उसकी बात सुनेगा? और सुन भी ले तो क्या उसकी बात पर विश्वास करेगा?
इन सब बातों को एक काली रात मानकर सुशील ने एक नई शुरुआत करनी चाही। वह फिर से अपने काम में लग गया। कम्पनी में निर्मल और सुन्दर के साथ काम करते-करते उन दोनों ने सुशील का दिल जीत लिया। सुशील को उनपर भरोसा हो गया। इसी भरोसे का फायदा उठाकर एक दिन निर्मल ने कम्पनी के कागज़ात पर हस्ताक्षर करवाते-करवाते सुशील की सारी सम्पत्ति भी अपने नाम करवा ली और अपने घर चला गया। हस्ताक्षर करते हुए उसे जरा भी आभास नहीं था की वह हस्ताक्षर कहाँ कर रहा है।
फिर क्या था, अगले दिन निर्मल अपने आदमियों के साथ सुशील के घर में घुसकर उसे जबरदस्ती घर से निकालने लगा। सुशील और सुनीता दोनों सोच रहे थे की ये हो क्या रहा है? सुशील के पूछने पर निर्मल ने वह कागज दिखाते हुए कहा - "अब इस घर और तुम्हारी सारी सम्पत्ति का मालिक मैं हुँ, निकल जाओ मेरे घर से।" सुशील ने कहा - "तुमने हमारे साथ इतना बड़ा विश्वासघात किया। मैं तुम्हें छोड़ूँगा नहीं" यह कहते हुए सुशील ने निर्मल पर हाथ उठाया, पर निर्मल के आदमियों ने उसे और उसकी माँ को घर से बाहर निकाल दिया।
सुबह से शाम हो गई, दोनों घर के बाहर ही बैठे रो रहे थे, सुशील को कुछ समझ नहीं आ रहा था की अब क्या करें? उन दोनों ने कई लोगों से मदद माँगनी चाही, पर किसी ने उनकी मदद नहीं की। सड़क पर चलते हुए अचानक उन्हें रामू ने देख लिया और पूछा - "सुशील! इतनी रात को तुमलोग यहाँ? और तुमलोग रो क्यों रहे हो? आखिर हुआ क्या है?" सुशील ने रोते हुए सारी बात बता दी और कहा - "तुमने सही कहा था। धोखेबाज तुम नहीं निर्मल है, मैंने तुम्हें ही गलत समझा, मुझे माफ़ कर दो।" रामू ने कहा - "जो हुआ उसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है। तुम्हारी जगह कोई भी रहता तो वही करता तो वही करता जो तुमने किया। रही बात माफ़ी की, तो जब तुमने गलती ही नहीं की तो माफ़ी किस बात की।" सुशील की माँ को भी अपने किए पर पछतावा हो रहा था, उन्होंने रामू से कहा - "बेटा! मैंने तुम्हें पहचानने में बहुत बड़ी गलती कर दी। मैंने तुम्हारे साथ गलत व्यवहार किया। मुझे माफ़ कर दो।" रामू ने फिर कहा - "आप मुझसे बड़ी हैं, आप मुझसे माफ़ी माँगकर मुझे शर्मिंदा ना करें। और सुशील! चलो अब मेरे घर, वहाँ तुम्हारे घर जैसा खाना तो नहीं, लेकिन मेरी माँ के हाथ की बनी रोटी जरूर मिलेगी।"
दोनों रामू के घर गए और भोजन किया। अगले दिन से उन्होंने एक नई शुरुआत की, अपने जीवन की भी और अपने मित्रता की भी।
- कुन्दन केशरी
झाझा, जमुई (बिहार)
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