तुम हो गृह की फुलवारी - by S. P. Dixit


तुम हो गृह की फुलवारी

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तुम  मेरे  गृह की  शोभा हो, तुम  हो  गृह की फुलवारी।

तुमसे आलय  आलोकित, तुम स्वर्ण  किरण हो न्यारी।।

जब से  तुम आईं  जीवन में, प्रहर्ष सुरभि  के द्वार खुले।

गृह-कानन  हुआ  सुरभित, हृदय  प्रेम   के  भाव  घुले।।


तुमने  टूटी  कुटिया को, स्वर्ण-प्रासाद  सा  सजा  दिया।

तिनका-तिनका  चुन  करके, भव्य  आवास बना दिया।।

तुमसे  गरिमा  है  घर  की,  तुम  बिन  सूना  मन-मंदिर।

तुम हो  पुष्पों  की  क्यारी, जीवन तुम  बिन है अस्थिर।।


तुमसे  होली  दिवाली  है, त्योहारों  की  शोभा  अनुपम।

पूजा-अर्चना  है  घर  में,  गूंजे  शुचि-मंत्रों  की  सरगम।।

तुम  हो  रंगोली आँगन की, गृह  का  वंदनवार हो तुम ।

मेरे  हृदय  के  सीपों  की, अभिराम-अंभसार  हो तुम ।।


जब  भी  निज  जीवन  तरिणी, तरंगों  में  डगमगाई  है।

संबल  तुम्हारा  मिला  मुझे, तुमने  नव-आश बंधाई है।।

शूल पूर्ण  रहे  पथ  कितने, पर  तुमने  साथ नहीं छोड़ा।

संग जीने की खाईं  कसमें, मुख को  कभी नहीं मोड़ा।।


विषाद पलों  में भी  तुमने, सर्वदा  ही  साथ निभाया है।

एक रोटी  भी रही  अगर, तुमने मिल बाँट के खाया है।।

तुम दयालुता  की  देवी, परार्थ से  सिंचित  उर  भाव हैं।

तुमने खुशियों से भरे सदा, जीवन के प्रत्येक पड़ाव हैं।।


मेरे  मनोरम  कानन  की, तुम  पुहुपों  की  छटा  रुचिर।

प्रेम-सौहार्द  तुममें  शोभित, वाणी  तुम्हारी सदा मधुर।।

तुम  गृह  की  नींव  प्रस्तर, परिवार  का  आधार  तुम्हीं।

तुमसे प्रहर्ष  निकेतन  में, सबकी  आस्था  प्यार तुम्हीं।।


- एस० पी० दीक्षित

उन्नाव, उत्तर प्रदेश

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