उम्र से मत आकलन कर - by Dr. Rishi Kumar Mani Tripathi


उम्र से मत आकलन कर

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उम्र से मत आकलन कर,

प्राण से मैं हूँ युवा, है शांत जीवन।

अभी तो अच्छी तरह मैनें नहीं मधुमास देखा।

अभी तो खिलती कली का, नहीं यौवन पाश देखा।।

मधुप बन रस चख न पाया, रूप यौवन की सुरा का।

अभी तो संसार ना देखा 

नयन भर।।

एक शिशु-सा सिर्फ मैं पाता रहा पोषण।

दूध माँ का पिया, आँचल की मिली छाया,

माँ बहन के प्यार से सेवित रही काया।

अभी तो अमराईयों की सघन छाया में पड़ा था।

जान दे देते जरा-सी रोग पर वह प्यार देखा।

माँ-पिता के स्नेह की अमृत सुधा का स्नान देखा।।

ज्ञान दे व्यवहार करने की कला का मान देखा

मात्र मेरे झुर्रियों का 

ध्यान मत कर।।

उम्र से मत आकलन कर।।

रोज निकले सूर्य 

उसमे तपिश मेरी।

है बड़ा आकाश उसमें गूजता

 हुँकार स्पंदन... गूँज मेरा।

उमड़ती नदियाँ जलधि की राशि की गहराइयाँ विस्तार मेरा।।

रोज विकसित हो रहे हैं पुष्प, खिलते गंध का

 प्रसरण हमारा।

इस बड़े संसार के भीतर 

उमड़ती प्रेम धारा का

 महा विस्तार सारा।

यही तो अनमोल कोषागार है सम्मान कर ,

उम्र से मत आकलन कर।।


- डॉ० ऋषि कुमार मणि त्रिपाठी

खलीलाबाद, उत्तर प्रदेश

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