आदमी - by Vinod Kumar Verma "Dard"
आदमी
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प्यार करता भी मगर नफरत भी करता आदमी।
दूसरों का प्यार देखे क्यों ये जलता आदमी।
जानता सब धर्म कहते प्यार से रह लो यहाँ,
जाति-मजहब नाम क्यों दंगा भी करता आदमी।
कर बुरा होगा बुरा सब लोग कहते हैं मगर,
हाँ बुरा फिर भी यहाँ पर खूब करता आदमी।
कौन जानें कब कहाँ पर यार धोखा दे सुनो,
आस्तीनी साँप बन कर साथ रहता आदमी।
दूसरों के जो इशारे पर सदा चलता रहा,
वक़्त निकला कुछ न पाया हाथ मलता आदमी।
जीत जेहन गर बसा ले तो चले अँगार पर,
हार की सोचे अगर तो यार डरता आदमी।
धन धरा रह जाएगा सब साथ जाता कुछ नहीं,
छोड़ भगवत वंदना को अर्थ गिनता आदमी।
जुल्फ बिखरा दो अगर तुम रूप महके और भी,
भूल जायें राह अपनी राह चलता आदमी।
"दर्द" कहता ज्ञान बातें कर अमल कुछ सोच कर,
राह भटके देख कर सच खूब हँसता आदमी।
- विनोद कुमार वर्मा "दर्द"
पृथ्वीपुर, मध्य प्रदेश
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