बनी मैं सबला - by Nand Kishor Bahukhandi


बनी मैं सबला

-

अमरबेल लतिका जैसे पुरुष के तन से लिपटी रही,

आश्रय पाने के लिए ही परजीवी बन जीती रही।

मुझको बना दिया अबला, कैद मुझे घर में किया,

रिश्तों की बेड़ियों में फिर मुझको जकड़ दिया गया।

युगों-युगों से सब सही, अश्रु अपने पीती रही,

दुखियारे हृदय की व्यथा किसी से भी न कही।

मर्यादाओं के उलाहने दिए, चौखट से बाहर न आने दिए,

घुट-घुट मैं जीती रही, विष का घूंट पीती रही।

बनी मैं घर की शोभा, पुरुष ने समझा एक खिलौना,

कभी बाजार में बैठाया, सतीत्व को मेरे दाँव लगाया।

माँ बहन बेटी बन कर, ममता की गागर उड़ेल कर,

इशारों पर नाचती रही, फिर भी ना दया आई।

बन गई हूँ अब सबला, नारी जीवन की समझी गरिमा,

अब मैं ना हूँ पराधीन, अपने मन जीऊँगी जीवन।

आत्मनिर्भर अब बनी, विचारों से स्वतन्त्र बनी,

दृढ़ संकल्प लिए मेरा मन, तोड़े वो सदियों के बंधन।

पुरुष से कंधा मिला चलूँगी, आजीविका अपनी अर्जित करूँगी,

परिवारों के सब बोझों को, मिल बाटूँगी उन सब को।

नई पीढ़ी की अब मैं नारी, तोड़ी पुरानी मान्यता सारी,

समाज में लानी है क्रांति, लांघ के वो सदियों की सीढ़ी।


- नन्द किशोर बहुखंडी

देहरादून, उत्तराखंड

No comments

Powered by Blogger.