बात - by Dr. Shaheda

बात

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बात लगती है नशतर की तरह,

जख्म देती हैं  ख़ंजर की तरह ।


ज़ुबां शीरीं अगर चे  होती है,

सुनने वाले को सुकून देती है ।


ये अगर तल्ख़ और कड़वी हुई,

सबके जिगर के आर पार हुई ।


बात ही बात में बात बढ़ गयी,

दायरा तोड़कर वो आगे बढ़ गयी।


 ये ख़ैरियत की मांगती है दुआ,

तो सबके साथ अच्छा ही हुआ ।


बददुआ किसी के लिये की गयी,

ज़ुबाँ दांतों के नीचे दब ही गयी ।


बीता समय वापस आना नहीं

बेकार की बातों में इसे गँवाना नहीं ।


याद रखो हमेशा मेरी बात को,

पहले सोचाे फिर करो बात को ।


- डॉ० शाहिदा

प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश

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