सिला - by Dr. Shaheda


सिला

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अश्कों से तर वरक़, लफ्ज़ भीगते रह गये,

क़तरा क़तरा उसे लहू से,  सींचते रह गये।


मुट्ठी से रेत सा फिसलता जहाँ चला गया,

वक्त तेज़ी से गुज़र गया हम देखते रह गये।


ख्वाबों में आके ,याद अपनी दिलाया उसे,

आदत थी भूलने की उसे , भूलते रह गये।


मोहब्बत का फ़साना,था सदियों पुराना,

मगर दिल के हालात से,  खेलते रह गये।


शमा के साथ जलकर मरे हैं परवाने सभी,

मौत से पहले शमा की लौ  चूमते रह गये।


लिफ़ाफ़े से ही ख़त का मज़मून भाँप लेते थे,

आज खत को हमारे कई बार घूरते रह गये।


वो यूँ ही ज़िंदा सलामत रहे, ये मेरी दुआ है,

जो ता ज़िंदगी हमारा हक़ छीनते रह गये।


मेरी मोहब्बतों का सिला मुझको मिला यही,

मुद्दतों से वो अपना पयाम भेजते रह गये ।


- डॉ० शाहिदा

प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश

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