जिक्र किसका करूँ - by Ashutosh Mishra
जिक्र किसका करूँ
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जिक्र किसका करूँ,
फ़िक्र में ही समय निकल जाता है।
दामन किसका पकड़ूँ,
अपनों को समझने में वक्त बीत जाता है।
एक ख्वाब पाला था हमने,
जिंदगी के दर्मियाँ,
जिंदगी को सवारने में,
ख्वाब रूठ जाता है।
जिक्र किसका करूँ,
फ़िक्र में ही समय निकल जाता है।
ले कर चला था एक कारवाँ,
जिंदगी के प्रथम पड़ाव से।
अपनों को अपना बनाने में,
साहिल छूट जाता है।
जिक्र किसका करूँ,
फ़िक्र में ही समय निकल जाता है।
थे हमारे भी बड़े अरमान,
उस मंजिल को पाने के।
मंजिल पाने के दौर में,
काया रूठ जाता है।
जिक्र किसका करूँ,
फ़िक्र में ही समय निकल जाता है।
दामन किसका पकड़ूँ,
अपनों को समझने में वक्त बीत जाता है।
- आशुतोष मिश्रा
देवरिया, उत्तर प्रदेश
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