खबर नहीं आई - by Dr. Shaheda


खबर नहीं आई

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एक अरसे से उसकी कोई खबर नहीं आई ।

उससे मिलने की कोई सूरत नज़र नहीं आई ।।


हर शाम उसके दस्तक का इंतज़ार रहता है , 

वो उल्फ़त का इक़रार करे इंतज़ार रहता है ।

आज भी आने की कोई ख़बर नहीं आई ,

उससे मिलने की कोई सूरत नज़र नहीं आई ।


करम नवाज़िश मेहरवानी हमेशा उसकी है , 

वो मुझे ग़म दे या ख़ुशियाँ मेहरवानी उसकी है। 

उसके अख़लाक में कभी कसर नहीं आई ,

उससे मिलने की कोई सूरत नज़र नहीं आई ।


तमन्ना बस मेरी रही दीदारे यार हो नसीब , 

आज दूर है मुझसे कल वो मेरे हो करीब ।

किसी सागर में ऐसी तूफानी लहर नहीं आई , 

उससे मिलने की कोई सूरत नज़र नहीं आई ।


उसके गले लग कर शिक्वे शिकायत कर सकूँ ,

इस तरह पूरी अपने दिल की हिकायत कर सकूँ ।

मेरी ज़िन्दगी में कभी ऐसी डगर नहीं आई ,

उससे मिलने की कोई सूरत नज़र नहीं आई ।


इस फ़ानी जिस्म से मेरी रूह परवाज़ कर सके, 

एक नयी ज़िंदगी का फिर आगाज़ कर सके ।

मेरी ग़ज़लो में कोई ऐसी बहर नहीं आई ,

उससे मिलने की कोई सूरत नज़र नहीं आई ।


- डॉ० शाहिदा

प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश

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