कुछ बीता कुछ बाक़ी है - by Dr. Shaheda
कुछ बीता कुछ बाक़ी है
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शाम हुई तो आने लगा उसका ख्याल भी,
बाद उसके याद आया उसका कमाल भी ।
वो सादगी, वो हुस्न था नज़रों में उसकी,
फीका रह गया चाँद का हुस्नो जमाल भी ।
ज़िंदगी के मरहले वो कैसे तय करती रही,
तन्हाई में मेरे ज़ेह्न में आया ये सवाल भी ।
कहीं धूप कहीं छाँव सा है जीवन उसका,
शांत देखा है लहु को और कभी उबाल भी ।
तक़दीर पर उसकी गुमां होता है बहुत,
दर्द उसकी दहलीज़ पर है बहुत बेहाल भी ।
समय पंख लगाकर बीता, आया चौथापन,
मंज़िल पाकर उसने क़ायम की मिसाल भी ।
नफ़रतों का ज़हर इस तरह बाँट रहे हैं सभी,
जीना मुश्किल था, मरना हुआ मोहाल भी ।
कुछ बीता कुछ बाक़ी है, पल पल बीतेगा,
मंज़ूर है ख़ुदा जिस हाल में रखे, वो हाल भी ।
- डॉ० शाहिदा
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश
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