मजदूर - Vijay Purohit


मजदूर

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शहरों में मजदूर जैसा,दर बद़र इंसान नहीं होता।

सबके घर बनाए खुद का कोई मकान नहीं होता।


न गर्मी की,न सर्दी की,ना बारिश की कोई चिन्ता।

विश्वास है ऊपरवाले का कोई आश पे नहीं जीता।

सबके घर बनाए खुद का कोई मकान नहीं होता।


मिर्चरोटी खिलाकर अपने बच्चों को पाल लेता है।

फिर भी कहाँ उन्हे पलभर का विश्राम नहीं होता।

सबके घर बनाए खुद का कोई मकान नहीं होता।


भटकता रहता है इधर से उधर परिवार को लेकर।

भले कष्ट हो कितना, मगर हार मान नहीं सोता।

सबके घर बनाए खुद का कोई मकान नहीं होता।


न द्वेष,ईर्ष्या से देखता है इस मतलबी दुनिया को।

नजर में सामने उनके नयन अभिराम नहीं होता।

सबके घर बनाए खुद का कोई मकान नहीं होता।


क्यों झूठा गुणगान करे,महलों में रहने वालो का।

बिना मेहनत की इनके,महलों में सुख कहाँ होता।

सबके घर बनाए खुद का कोई मकान नहीं होता।


ये भूखे रहकर भी अपने काम को अंजाम देते है।

इनकी हरकतों में न तृप्ति ना आराम कहीं होता।।

सबके घर बनाए खुद का कोई मकान नहीं होता।


तन-मन जलाता नित तिलमिलाती धूप में अपना।

खटकता रहता है पत्थर से, आराम से नहीं सोता।

सबके घर बनाए खुद का कोई मकान नहीं होता।


छिल जाते है इनके पग डगर-डगर, कदम-कदम।

रोशनी देता जलके सबको,खुद अँधेरे में ही सोता।

सबके घर बनाए खुद का कोई मकान नहीं होता।


चाहे लाख मुश्किले आएँ इन्हें हालातों को लेकर।

"विजय"आशाकिरण चेहरे पे, विश्वास नहीं खोता।

सबके घर बनाए खुद का कोई मकान नहीं होता।

शहरों में मजदूर जैसा दर बद़र इंसान नही होता।।


- विजय पुरोहित

रामगढ़-शेखावाटी, राजस्थान

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