ओ! मेरे चाँद - by Pushpa Mishra
ओ! मेरे चाँद
-
कल अमावस की रात थी
हमेशा से मुझे
आकर्षित करने वाला
मेरे सपनों का आधार
जिसके इर्द-गिर्द हमेशा से है सजा
मेरे कल्पनाओं का संसार
हाँ, वो चाँद
वो चाँद नदारद था।
अमावस के बाद वह निकलेगा
इसी उम्मीद से एक टक लगाये
निहारती हूँ आसमान
आज नहीं दिखे तुम ओ! चाँद
पर आसमान में तुम्हारी उपस्थिति
शाश्वत सत्य है।
तुम ही रहे हो साक्षी, मेरे साथी
जीवन के सफर में
बचपन से लेकर तरूणाई तक
हठ से लेकर प्रेम तक
रूठने से लेकर मनुहार तक
हमेशा साथ चलते रहे हो।
निहारती रही हूँ तुम्हें कभी
आँगन की चारपाई पर लेटे हुए
तो कभी रेल के सफर में
खिड़की से राहों में चलते हुए
सांझ ढले सूरज की धूमिल होती रौशनी में
आसमान में मुस्कराते हुए।
माँ की लोरी सुनने से लेकर
बेटे को लोरी सुनाते हुए
प्रेम के उपजने से लेकर
परिणय-सूत्र में बँधते हुए
जल में तुम्हारे प्रतिबिम्ब निहारने से लेकर
करवाँ चौथ का अर्घ्य देते हुए
तुम हो तो मेरा होना है
मेरा यह जीवन और मेरी कल्पना है।
तुम हो तो आस है
जीवन में विश्वास है
तुम्हारी प्रेरणा ही
जीवन की गति है।
तुम हो मेरे संरक्षक
साथ रहते हो हमेशा
तुम हो मेरे मित्र
हौसला बढ़ाते हो हमेशा।
ओ! चाँद सूनो तो
तुम्ही हो धरती को थामे हुए
संतुलित है अपनी धुरी में वह
क्यों! हो रहे हो दूर धीरे-धीरे
थामे रखना हमें संतुलित रहे हम
अपनी धूरी में ओ! चाँद
बस इतना ही है कहना
यूँ ही आसमान में दिखते रहना।
- पुष्पा मिश्रा
कोलकाता, पश्चिम बंगाल
No comments