समय का पहिया - by Priyadarshani Acharya
समय का पहिया
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जीवन की अंजुली से समय रेत-सा फिसल रहा,
मत व्यर्थ गँवा बर्बाद इसे कर, संभल ले अब तू जरा।
अगर धन खर्चे तो फिर जुट जाए,
रोग तन को खोए तो फिर पा जाए।
समय गर निकल जाए, फिर हाथ नहीं आए।
समय की कीमत को तुम पहचानो,
समय होत बलवान इसकी ताकत जानो।
बीता समय लौट के न आए चाहे कर लो कोई जतन,
समय का पहिया चलता रहता चहुँओर चहुँदिशि,
न रुका, न रुकता है, न रुकेगा कभी,
गतिमान यह अहर्निशि।
प्रकृति भी करती समय से काम,
सूर्य चंद्रमा भी होते समय से ही चलायमान,
ऋतुएँ भी आती और जाती काल क्रमानुसार,
फिर क्यों तू इस बहुमूल्य समय को खोता।
अनवरत समय का पहिया चलता रहता।
समय चक्र घूमता ही रहता.....
- प्रियदर्शिनी आचार्य
मथुरा, उत्तर प्रदेश
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