शहीद - by Dr. Shaheda
शहीद
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सरहद पर जिसने जान गँवाई,
एक बहन का वो प्यारा भाई।
देश की सेवा जिसकी रग-रग में,
ऐसा था देश का वीर सिपाही।।
एक पिता के जन्मों की कमाई,
जिसे उँगली पकड़कर राह दिखाई।
आँखों से आँसू रुकते ही नहीं है,
दुख की खबर सरहद से आई।।
एक माँ भी भाग्य से धोखा खाई,
सब्र नहीं होता ये पल दुखदाई।
दोनों हाथ मले रो-रो कर पूछे,
क्या भूल हुई जो ये विपदा आई।।
कुछ दिन पहले ब्याह कर आई,
माँग में सिंदूर हाथों में मेंहदी रचाई।
अंधकार हो गया जीवन उसका,
उजड़ गया सुहाग विधवा कहलाई।।
घरों में बैठ भूल गए बलिदानों को,
देश की खातिर कितनो ने जान गँवाई।
हाथों में तिरंगा लेकर कितने वीरों को,
माँ बहनों और पत्नी ने की है बिदाई।।
- डॉ० शाहिदा
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश
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