शीश झुकाऊँ - by Prem Kumar Tripathi 'Prem'


शीश झुकाऊँ

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जिस आयु में यौवन लोगों का, 

श्रृंगार महल में सोता था।

उस आयु में यौवन वीरों का,

काँटो पर सोया होता था।।


हाथ लिए पिस्तौल देश की,

रक्षा ऐसे करते थे।

विकट सुरक्षा सियाराम की,

लक्ष्मण जैसे करते थे।।


आजादी पर जान निछावर,

करते रहते रात-दिवस।

लहू खौलता हुआ देखकर,

भागे गोरे हुए विवश।।


त्यागी और तपस्वी की यह, 

जगत कहानी कहती है।

औरों की खातिर जो जी ले, 

गाथा उसकी लिखती है।।


आजादी के वीर बाँकुरों,

का पावन-पावन इतिहास।

राष्ट्रधर्म पर मिटकर हमको, 

लौटाया खोया मधुमास।।


माँ की आँखों के तारों पर,

बार-बार बलि जाऊँ।

किस-किस गुण पर नमन करूँ,

किस-किस पर शीश झुकाऊँ।।


- प्रेम कुमार त्रिपाठी 'प्रेम'

प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश

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